Jat Gotar History

शिवाच जाट क्षत्रिय आर्य गोत्र

मानव जाति के पूर्वज गोत्र प्रवर द्वारा पाण्डू लिपि लेखक चौधरी ओमप्रकाश शिवाच रोहतक ने लिखा है शिवाच जाट गोत्र जो शिवजी महाराज के नाम पर है, शिव गोत्र की एक शाखा है। शिवाजी के नाम पर जितने भी गोत्र हैं जैसे शिवा, साऊथ कोरिया में, मलेशिया में सिंघापुर में , शिबाटा जापान में, शिवियन चीन में, शिवि चीन में शिब्बा पौलेण्ड में शिबली इंग्लैड में, शिव का ग्रीक में, शिविरेनू -फ्रांस में, शिवालक कैनाडा, शिव अप्पा - दक्षिण भारत, शिवलकर-गोवा में, शिवाचयान -केरल शिवान, भारत के सभी प्रान्तों में, शिवान - न्यूजीलैण्ड में, शिवान भारत के सभी प्रान्तोंमें, शिवान- न्यूजीलैण्ड में, शिवमानी-तमिलनाडू में, आदि शाखाएं आदिकाल में सभी एक साथ रहते थे। शिवजी के नाम से कई स्थान हिमालय की गोद में आज भी पाए जाते हैं। यहां से ये लोग उत्तर पश्चिम की दिशा में जहां बसे उस स्थान का प्राचीन नाम जटलैण्ड में प्रचलित था।

गोत्र अध्ययन से इस बात की पुष्टि होती है कि शिवजी आदि माहपुरूषों में से थे। भारतीय मान्यताएं, जनश्रुतियां तथा सामाजिक स्थापनाएं सभी इस ओर इंगित होती हैं। कई शिव जनपदों का ऋग्वेद का भाष्य करने वालों ने वर्णन किया है। कैलाश पर्वत व शिवजी के गणों का पुराणों में विस्तृत वर्णन उपलब्ध है। महाभारत में शिवजी के 1008 नामों का उल्लेख मिलता है । जो उनके गुण कर्म स्वभाव और इतिहास पर प्रकाश डालते हैं। प्राचीन प्रसिद्ध नाम स्ािाण्वीशवर जो कुरुक्षेत्र के पास विद्यमान है। सम्भव है इसे शिवजी हाराज ने बसाया हो। वे स्वयं भी वहां निवास करते थे। कुरुकत्र्ता, कुरुवासी, कुरूभूत ये नाम शिवजी के ही है। महादेव जी सभी विद्याओं के द्वारा सबके कष्टों को हरते थे, इस गुण के कारण े ह नाम से सारे विश्व में विख्यात हुए। सारा भारत हर हर महादेव ने अपनी महारानी पार्वती, गौरीपुत्र गणेश और कार्तिकेय को इस कुरूभूमि के निर्माण में लगा दिया। कार्तिकेय ने हरिद्वार के निकट मयुरपुर नामक नगर बसाया जो कनरवल में अब भी मायापुर के नाम से प्रसिद्ध है। सूर्य सिद्धांत ग्रन्थ के अनुसार रोहतक नगर हजारों वर्षों से भी पुराना है। इसी नगर रोहतक को कार्तिकेय ने अपनी राजधानी व निवास स्थान बनाया था। जिस समय शिव ब्रह्मा -इन्द्र और विष्णु आदि ने अपनी देव सेना का सेनापति कार्तिकेय को चुना तब सभी ने उसको अपनी भेंट दी। उसी समय सुपर्ण जो देवों में महायोद्धा थे, ने कार्तिकेय को मोर चिन्ह दिया।

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